चाक पर रखी मिट्टी की

होती हैं हसरतें हजार

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कोई दिया बन के जुगनुओं सा

रातो में भटकना चाहता है

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कोई दीप बन के जलना

चाहता है ख्वाबों में

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मशाल बन कर हुजूर की कोई

दरबार में सजना चाहता है

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दीपक बनाकर किस्मत की

कोई मंदिरों में जगना चाहता है

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चराग बन के उम्मीदों का कोई

हवाओं से लड़ना चाहता है

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कोई चुल्हा बनकर भूख की

आग बुझाना चाहता है

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आफताब बनकर कोई

मेहराबों पर सजना चाहता है

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बन के शमां बज़्म की कई तो

रौशन शाम करना चाहते हैं

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तो कोई शमां कोठे पर

बुझ भी जाना चाहती है

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बन के मिट्टी फिर से

नहीं चाक पर चढ़ना चाहती है

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कुम्हार के हाथों घूमकर

सारी दुनियां देख ली

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चाक पर चढ़ने के बाद

मिट्टी भी मां नहीं रही

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mukeshkrd@gmail.com